05 अक्टूबर, 2011
भगवान ने ये दुनिया कैसे बनाई?
22 जून, 2011
भारत की पुरातन अवधारणा सही सिद्ध हो रही है
अभी तक आइन्स्टाइन के सूत्रों पर आधारित सिद्धान्त या परिकल्पनाएं, जैसे 'महान विस्फ़ोट', उस विस्फ़ोट के क्षण के पहले की घटनाओं की कल्पना भी नहीं कर सकतीं क्योंकि वह 'विचित्रता' (सिंगुलैरिटी) का क्षण है जो हमारी समझ के परे है, अर्थात उस क्षण के तथा उसके पूर्व के काल की वैज्ञानिक अपने सूत्रों के अनुसार कल्पना भी नहीं कर सकते।
वुन यी शु आइन्स्टाइन की यह बात तो मानते हैं कि दिक और काल एक दूसरे से स्वतंत्र नहीं हैं, और वे यह भी मानते हैं कि लम्बाइयां तथा द्रव्यमान उस पदार्थ के वेग पर निर्भर करते हैं। किन्तु वे आइन्स्टाइन के आगे जाकर यह दावा करते हैं कि न तो प्रकाश का वेग अचर है और न गुरुत्वीय अचर ही अचर है।
उनके ब्रह्माण्डीय सूत्रों में अद्भुत बातें तो हैं किन्तु कोई 'विचित्रता' नहीं है अर्थात वे अपने सूत्रों के द्वारा महान विस्फ़ोट के पूर्व की भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। वे पाते हैं कि ब्रह्माण्ड का विस्फ़ोट होता है, प्रसार होता है, और फ़िर प्रसार रुककर संकुचन प्रारंभ हो जाता जो अंत में एक बिन्दु में समाहित हो जाता है और फ़िर विस्फ़ोट होता है, और यह क्रम सतत चलता रहता है।
ब्रह्माण्ड की यही अवधारणा हमारे पुराणों में मिलती है - सृष्टि के रचयिता 'ब्रह्मा' का दिन वह है जब प्रसार हो रहा होता है और रात्रि वह है जब संकुचन हो रहा होता है, और यह सतत होता रहता है।
सावधानी का एक शब्द – आइन्स्टाइन के विरोध में प्रति माह नहीं तो प्रति वर्ष कोई न कोई सिद्धान्त आते रह्ते हैं किन्तु जब प्रमाणों कि परख होती है तब वे एक बुलबुले की तरह फ़ूट जाते हैं। मैं कामना करता हूं कि यह सिद्धान्त प्रमाणों पर खरा उतरे!!
सच्चा प्रेम आइन्स्टीन के कथन में..
हॉकिंग के ईश्वर
आइंस्टीन भी हुए थे फेल
बड़े होने पर वह पॉलीटेक्निक इंस्टीच्यूट की प्रवेश परीक्षा में भी फेल हो गये. हालांकि, उन्हें भौतिकी में अच्छे नंबर आये थे, पर अन्य विषयों में वह बेहद कमजोर साबित हुए. अगर वह निराश हो गये होते, तो क्या दुनिया आज यहां होती. उन्हें फादर ऑफ मॉडर्न फिजिक्स कहा जाता है. जिंदगी के किसी एक मोड़ पर असफलता मिलते ही आत्मघाती कदम उठाने वाले युवा आइंस्टीन से सीख सकते हैं. युवाओं को सही दिशा देने में अभिभावकों व शिक्षकों की भी अहम भूमिका है. हमारे यहां बुद्धिमता के बस दो पैमाने हैं-पहला मौखिक (वर्बल), जिसमें सूचनाओं का विेषण करते हुए सवाल हल किये जाते हैं व दूसरा गणित या विज्ञान. देर से ही सही अमेरिकी मनोविज्ञानी गार्डनर के विविध बुध्दिमता के सिद्धांत को बिहार के स्कूलों में भी अपनाया जा रहा है. गार्डनर ने बताया कि बुद्धिमता आठ तरह की होती है. इसीलिए गणित या अंगरेजी में फेल हों या आइआइटी की प्रवेश परीक्षा में असफलता मिले, तो हार न मानें. असफलता तो सफलता की सीढ़ी है. आइंस्टीन ने भी यही माना और अपने परिवार,पड़ोसी व गुरु जी को गलत साबित कर दिया. जो मानते हैं कि आप जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते, उन्हें आप भी गलत साबित कर सकते हैं.
फ्रेंकलिन के लिए अल्बर्ट आइंस्टीन का पत्र
7 मार्च, 1940, लांग आईलैंड
महोदय,
मैं आपका ध्यान उन नई गतिविधियों की तरफ आकर्षित करना चाहता हूं जो आपके द्वारा आयोजित सरकारी प्रतिनिधियों और वैज्ञानिकों के बीच हुए सम्मेलन के बाद घटित हुई. पिछले साल जब मैंने महसूस किया कि यूरेनियम पर हुए अनुसंधान राष्ट्रीय महत्व के हो सकते हैं, तो मैने सोचा कि यह मेरा कर्तव्य है कि मैं प्रशासन को इसकी संभावना के संबंध में सूचना दूं. आपको शायद याद हो कि मैंने राष्ट्रपति को संबोधित एक पत्र में इस तथ्य का उल्लेख किया था कि जर्मनी के एक अंडर सेकेट्री का बेटा सी एफ वॉन विजसैकर रसायनविदों के एक समूह के साथ मिल कर कैसर विल्हेम संस्थान जो कि एक-रसायन विज्ञान का संस्थान है, में यूरेनियम पर काम कर रहा है.
युद्ध शुरू होने के बाद जर्मनी में यूरेनियम को लेकर रुचि कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ गई है. मुझे पता चला है कि यूरेनियम पर अनुसंधान काफी गोपनीय तरीके से हो रहा है और इस पर कैसर विल्हेम संस्थान के भौतिकी संस्थान में भी काम किया जा रहा है. यह सरकार के अधीन हो गया है. सी एफ वॉन विजसैकर के नेतृत्व में रसायन विज्ञान संस्थान के साथ भौतिकी के विद्वानों का एक समूह यूरेनियम पर काम कर रहा है. इसके पूर्व निदेशक को युद्ध की अवधि के दौरान छुट्टी पर भेज दिया गया है. अगर आपको लगता है कि राष्ट्रपति को यह जानकारी देना उचित होगा तो कृपया ऐसा करें.
साथ ही आप कृपा करके मुझे बताएं कि क्या आप इस दिशा में कुछ कार्रवाई कर रहे हैं? डॉ स्जिलार्ड ने मुझे फिजिक्स रिव्यू में भेजने के लिए पांडुलिपि दिखाई है जिसमें उन्होंने विस्तार से यूरेनियम में एक शृंखला प्रतिक्रिया स्थापित करने की एक विधि का वर्णन किया है. अगर इसे रोका नहीं गया तो यह पेपर प्रकाशित हो जाएगा.
अब प्रश्न यह उठता है कि इसकाप्रकाशन रोकने के लिए कुछ किया जाना चाहिए या नहीं? मैंने प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विगनर से इस उपलब्ध सूचना पर चर्चा की है. डॉ स्जिलार्ड अक्टूबर से हुई अब तक की गतिविधियों पर एक ज्ञापन देंगे ताकि आप उचित परिस्थितियों के लिए जरूरी कार्रवाई कर सकें.
आप यह देख सकते हैं कि जो तरीका वह अपना रहे हैं वह काफी अलग है और ज्यादा उचित है. खास तौर से फ्रांस के एम जोलिओग की तुलना में, जिनके काम की रिपोर्ट आपने अखबारों में पढ़ी होगी.
आपका
अल्बर्ट आइंस्टीन
कहने को कुछ है : आइंस्टीन
मेहमानों पर प्रतिक्रिया अच्छी नहीं हुई। आइंस्टीन ने असंतोष भाँप लिया और पुन: मंच पर पहुँचे - 'मुझे क्षमा कीजिएगा, जब भी मेरे पास कहने के लिए कुछ होगा, मैं स्वयं आप लोगों के सम्मुख उपस्थित हो जाऊँगा।' छ: वर्ष बाद डॉ. आटे लॉटे को आइंस्टीन का तार मिला - 'बंधु, अब मेरे पास कहने जैसा कुछ है।'
शीघ्र ही प्रीति-सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस बार आइंस्टीन ने अपने 'क्वांटम सिद्धांत' की व्याख्या की, जो किसी भी मेहमान के पल्ले नहीं पड़ी।
18 जून, 2011
आइन्स्टाइन के सिद्धांत के दो प्रमुख पूर्वानुमानों की पुष्टि
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के इस परीक्षण उपग्रह (ग्रैविटी प्रोब बी ने) आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण के सामान्य सिद्धांत के दो प्रमुख पूर्वानुमानों की पुष्टि कर दी है।
- किसी पिंड का गुरुत्वाकर्षण उसके इर्द-गिर्द के अंतराल और समय(Space and Time) के रूप आकार को विकृत कर देता है।
- अपनी धुरी पर घुर्णन करता यह पिंड अपने आस पास के अंतराल और समय को अपने साथ साथ खींचता चलता है।
आइंस्टीन के इन दो पूर्वानुमानों की जांच करने के उद्देश्य से 2004 में अंतरिक्ष में भेजे गए ग्रैविटी प्रोब बी परीक्षण के अंतर्गत अत्याधिक सटिक परिणामो वाले चार जायरोस्कोप इस्तेमाल किए गए। पृथ्वी के गिर्द परिक्रमा करने वाले इन जायरोस्कोपों का काम यह पता लगाना था कि क्या पृथ्वी और अन्य विशाल पिंड अपने गिर्द अंतरिक्ष और समय को उस रूप में प्रभावित करते हैं, जैसा आइंस्टीन का मानना था। और अगर हां, तो किस सीमा तक।
परीक्षण के प्रमुख जांचकर्ता फ्रांसिस ऐवरिट पैलो ऐल्टो कैलिफोर्निया के स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। उन्होंने परीक्षण की चर्चा करते हुए बताया,
‘हमारे परीक्षण में जायरोस्कोप पृथ्वी की कक्षा में स्थित किए गए। इस प्रश्न का उत्तर ज्ञात करने के लिए कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और घूर्णन का क्या क्या असर होता है। हमारा जाइयरोस्कोप पिंगपांग की गेंद के नाप और आकार का है और चक्कर काटती हुई इस गेंद को एक तारे(आई एम पेगासी) की दिशा में निर्देशित किया जाता है। इसकी दिशा मे कोई भी बदलाव पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और घूर्णन का परिणाम स्वरूप ही होगा।’
अगर गुरुत्वाकर्षण का ’अंतरिक्ष और समय(Space-Time)’ पर असर न पड़ता, तो पृथ्वी की ध्रुवीय कक्षा में स्थित किए गए ये जायरोस्कोप हमेशा एक ही दिशा में लक्षित रहते। लेकिन पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के असर से जायरोस्कोपों के चक्कर की दिशा में थोड़ा, लेकिन मापा जा सकने वाला परिवर्तन हुआ और इस तरह आइंस्टीन की धारणा को पुष्टि हो गई।
न्यूटन और आइंस्टीन के ब्रह्मांड
आइंस्टीन से पहले तक अंतरिक्ष और समय को किसी भी असर से मुक्त माना जाता था। इस संबंध में बात करते हुए फ्रांसिस ऐवरिट कहते हैं,
‘अगर हम वैज्ञानिक आइजक न्यूटन की परिकल्पना के ब्रह्मांड में रह रहे होते, जहां अंतरिक्ष और समय अबाधित हैं, तो घूमते हुए किसी जायरोस्कोप की दिशा ज्यों की त्यों रहती। लेकिन आइंस्टीन का ब्रह्मांड इससे अलग है, और उसमें दो अलग अलग तरह के असर होते हैं। पृथ्वी के द्रव्यमान के प्रभाव से अंतरिक्ष में आने वाली विकृति और पृथ्वी के घूर्णन के परिणाम से अंतरिक्ष में आने वाला खिंचाव।’
शहद में डूबी पृथ्वी?
यह खिंचाव किस रूप में पैदा होता है, इसका स्पष्टीकरण ऐवरिट एक बहुत ही दिलचस्प तुलना के साथ करते हैं,
‘कल्पना करें कि पृथ्वी शहद में डूबी हुई है। तो जब पृथ्वी घूमेगी, तो वह अपने साथ अपने आसपास के उस शहद को भी अपने साथ खींचती चलेगी। इसी तरह वह जायरोस्कोप को भी साथ खींचती चलेगी।’
जीपीबी परीक्षण के बारे में ऐवरिट का कहना है कि आइंस्टीन की दो धारणाओं के प्रमाणित होने का पूरी अंतरिक्ष भौतिकी में हो रही खोजों पर असर पड़ेगा। जीपीबी अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के इतिहास की सबसे अधिक काल तक चली परियोजनाओं में से है, जिसकी शुरुआत 1963 में हुई। उसने ब्योरा जुटाने का अपना काम दिसंबर 2010 में समाप्त किया।
जीपीबी की व्यापक पहुंच
जीपीबी के परिणाम में हुए आविष्कारों का इस्तेमाल जीपीएस तकनीक में किया गया है, जिनके नतीजे में विमान बिना सहायता के उतर पाते हैं। जीपीबी की अतिरिक्त तकनीक नासा के कोबी मिशन में भी इस्तेमाल की गईं, जिस मिशन ने ब्रह्मांड के पृष्ठभूमि प्रकाश का सुस्पष्ट रूप से सही निर्धारण किया। जीपीबी टेक्नोलॉजी की ही सहायता से नासा का गुरुत्वाकर्षण और जलवायु परीक्षण संभव हो पाया और साथ ही यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का ओशन सर्कुलेशन ऐक्सप्लोर भी।
17 जून, 2011
प्रो. स्टीफन हॉकिंग से 10 सवाल
प्रो. हॉकिंग - मैं ये दावा नहीं करता कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। ईश्वर या भगवान एक नाम है जिससे लोग अपने अस्तित्व को जोड़ते हैं और अपनी जिंदगी के लिए जिसके शुक्रगुजार होते हैं। लेकिन मेरी समझ से सौरमंडल के इस तीसरे ग्रह पर जिंदगी और अपनी मौजूदगी के लिए भौतिक विज्ञान के नियमों का आभार मानना चाहिए, न कि भगवान जैसी किसी सार्वजनिक सत्ता का जिसके साथ व्यक्तिगत रिश्ता जोड़कर हम खुद को भुलावे में रखते हैं।
सवाल 02 – क्या कभी ब्रह्मांड का भी अंत होगा? अगर हां, तो इस अंत के बाद क्या होगा?
प्रो. हॉकिंग - एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जरवेशंस बताते हैं कि हमारा ब्रह्मांड फैल रहा है और इसके फैलने की रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही है। ब्रह्मांड हमेशा ही फैलता रहेगा और इसके साथ-साथ ये और भी ज्यादा अंधकारपूर्ण और खाली जगहों को जन्म देता रहेगा। ब्रह्मांड का जन्म बिगबैंग की घटना से हुआ था, लेकिन इसका कोई अंत नहीं है। कोई ये भी पूछ सकता है कि बिगबैंग से पहले क्या था, लेकिन इसका जवाब भी ये होगा कि जैसे दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचकर दक्षिण दिशा लुप्त हो जाती है, उसी तरह बिगबैंग से पहले कुछ भी नहीं था। क्योंकि बिगबैंग एक शुरुआत है, इस शुरुआत से पहले कैसे कुछ हो सकता है।
सवाल 03 – क्या आपको लगता है कि मानव सभ्यता का वजूद इतने लंबे समय तक बरकरार रहेगा कि वो अंतरिक्ष में गहरे और गहरे छलांग लगा सके?
प्रो. हॉकिंग - मुझे लगता है कि मानव जाति के पास अपने अस्तित्व को तबतक बचाए रखने के बेहतर मौके हैं जब तक कि हम अपने सौरमंडल को कॉलोनाइज नहीं कर लेते। हालांकि इस पूरे सौरमंडल में हमारे लिए पृथ्वी जैसी माकूल कोई दूसरी जगह नहीं है, इसलिए अभी ये स्पष्ट नहीं है कि जब ये धरती ही जीवन के किसी भी स्वरूप के रहने के लायक नहीं रहेगी, ऐसे हालात में मानव जाति बचेगी या नहीं। मानव जाति के वजूद को ज्यादा से ज्यादा लंबे वक्त तक बरकरार रखने के लिए दूसरे सितारों की दुनिया तक हमारा पहुंचना जरूरी है। अभी इसमें काफी वक्त है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि तब तक हम पृथ्वी पर खुद को बचाए रखने में कामयाब रहेंगे।
सवाल 04 – अगर आप अल्बर्ट आइंस्टीन से बात कर सकते, तो उनसे क्या कहते?
प्रो. हॉकिंग - मैं उनसे कहता कि वो आखिर ब्लैक होल्स में यकीन क्यों नहीं करते। उनके रिलेटिविटी के सिद्धांत के फील्ड समीकरण बताते हैं कि एक विशाल सितारा या गैसों का सघन बादल खुद में ही नष्ट होकर एक ब्लैक होल को जन्म दे सकता है। आइंस्टीन खुद इस तथ्य को जानते थे, लेकिन फिरभी उन्होंने किसी तरह खुद को समझा लिया था कि किसी भी धमाके की तरह हर विस्फोट द्रवमान या वजन को बाहर फेंक देने के लिए ही होता है। यानि वो मानते थे कि सितारों की मौत होते ही एक धमाके के साथ उसका सारा पदार्थ बाहर छिटक जाता है। लेकिन अगर विस्फोट हो ही नहीं और सितारे की मौत होते ही उसका सारा द्रव्यमान बस उसके एक ही बिंदु में सिमटकर रह जाए तो?
सवाल 05 – ऐसी कौन सी वैज्ञानिक खोज या विकास है जिसे आप अपने जीवनकाल में ही साकार होते हुए देखना चाहते हैं?
प्रो. हॉकिंग - मैं चाहूंगा कि मेरे जीवनकास में नाभिकीय फ्यूजन ही ऊर्जा का व्यावहारिक जरिया बन जाए। इससे हमें ऊर्जा की अक्षय आपूर्ति होती रहेगी और वो भी ग्लोबल वॉर्मिंग या प्रदूषण के खतरों के बगैर।
सवाल 06 – मृत्यु के बाद हमारी चेतना का क्या होता है? आप क्या मानते हैं?
प्रो. हॉकिंग - मैं मानता हूं कि हमारा मस्तिष्क एक कंप्यूटर और चेतना उसके एक प्रोग्राम की तरह है। ये प्रोग्राम उस वक्त काम करना बंद कर देता है, जब उसका कंप्यूटर टर्न ऑफ हो जाता है। सिद्धांतत: हमारी चेतना की रचना न्यूरल नेटवर्क पर फिर से की जा सकती है। लेकिन ऐसा करना बेहद मुश्किल है, इसके लिए मृतक की सारी स्मृतियों की आवश्यकता पड़ेगी।
सवाल 07 – आप एक ब्रिलिएंट फिजिसिस्ट के तौर पर मशहूर हैं, आपकी ऐसी कौन सी आम रुचियां हैं, जो शायद लोगों को हैरान कर सकती हैं?
प्रो. हॉकिंग - मुझे हर तरह का संगीत पसंद है, पॉप, क्लासिकल और ऑपेरा, हर तरह का। मैं अपने बेटे टिम के साथ मिलकर फॉर्मूला वन रेसिंग का भी मजा लेता हूं
सवाल 08 – क्या आपको कभी ऐसा लगा कि आपकी शारीरिक अक्षमता की वजह से अपने शोध में आपको फायदा पहुंचा, या इससे आपके अध्ययन में रुकावट आई?
प्रो. हॉकिंग - हालांकि मैं खासा दुर्भाग्यशाली रहा कि मोटर-न्यूरॉन डिसीस जैसी बीमारी की चपेट में आ गया, इसके अलावा जीवन के दूसरे सभी मामलों में मैं खासा भाग्यशाली रहा। मैं खुद को काफी खुशनसीब समझता हूं कि मुझे थ्योरेटिकल फिजिक्स में काम करने का मौका मिला, और अपनी लोकप्रिय किताबों की मदद से मैं जैकपॉट को हिट करने में कामयाब रहा। ये काम के ऐसे कुछ ऐसे गिने-चुने क्षेत्र है, जहां शारीरिक अक्षमता से कोई फर्क नहीं पड़ता।
विज्ञान-लेख
सवाल 09 – जिंदगी के सभी रहस्यों के जवाब लोग आपसे जानने की अपेक्षा रखते हैं, क्या इससे आपको एक बड़ी जिम्मेदारी का बोध नहीं होता?
प्रो. हॉकिंग - देखिए, जिंदगी की सभी समस्याओं का हल यकीनन मेरे पास नहीं है। फिजिक्स और गणित ये तो बता सकते हैं कि ब्रह्मांड का जन्म कैसे हुआ, लेकिन इनसे मानवीय व्यवहार के रहस्यों को नहीं समझा जा सकता। क्योंकि अभी बहुत से सवालों को सुलझाना बाकी है। लोगों को समझने के मामले में मैं अनाड़ी हूं। दूसरे लोगों की तरह मैं भी अब तक ये नहीं समझ पाया हूं कि लोग किसी चीज पर विश्वास कैसे कर लेते हैं, खासतौर पर महिलाएं।
सवाल 10 – क्या आपको लगता है कि कभी ऐसा वक्त भी आएगा, जब मानव जाति फिजिक्स के बारे में सबकुछ जान-समझ जाएगी?
प्रो. हॉकिंग - मुझे लगता है, कि ऐसा कभी नहीं होगा
आइन्स्टीन और कुम्हार ...
तो बात उस समय की है जब उनका व्याखयान समाप्त होता है और वे टहलने के लिए पैदल ही निकलते हैं, अभी कुछ दूर बढते हैं। रास्ते में सड़क के किनारे एक कुम्हार अपनी चाकी चला रहा है और मन चाहे ढंग की कृति तैयार कर रहा है। यह देखकर वे रूक जाते हैं, और मग्न होकर उसकी विलक्षण योग्यता एवं उसके द्वारा गढ कर तैयार की जाने वाली सृष्टि को बड़ी देर तक देखते रहते हैं।
फिर उससे कहते हैं तुम तो बहुत कुशल व्यक्ति हो, भगवान के लिए अपनी कला का कोई नमूना मुझे भी दो। ताकि मैं इसे ले जाकर औरों को भी दिखा सकूँ कि ऐसा भी होता है।
कुम्हार ने तुरन्त अपनी सबसे सुन्दर कलाकृति प्रेम से उनके हाथ में रखते हुए कहा- यह लीजिए, यह आपके इश्वर के लिए। और जब वे पर्स से पैसे निकालकर उसे देने लगे तो कुम्हार ने कहा- ये पैसे किस बात के लिए, आपने अपने लिए तो कुछ मांगा ही नही, यह तो भगवान के लिए मांगा है, तो आप ही बताइए- भगवान से कोई पैसे लेता है क्या?
यह सुनकर वे अवाक रह गये, उसे प्रणाम किया और चल दिए। किन्तु इसके बाद वे जब भी व्याखयान देते, उस घटना का जिक्र करना नही भूलते। आइन्स्टीन का कहना है- प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई ऐसा गुण जरूर होता है जिसे खोजकर आत्मसात किया जा सकता है। मैं स्वयं इसकी पूरी कोशिश करता हूँ, और आपको भी ऐसा करना चाहिए। क्योंकि यहाँ तो पूरा जीवन ही पाठशाला है। जीवन का हर क्षण, प्रत्येक घटना अपने में कोई न कोई सीख समेटे हुए होती है। बस हमें अपने अन्दर ललक पैदा करनी चाहिए, इच्छाशक्ति बढ़ानी चाहिए और दृढ विश्वास उत्पन्न करना चाहिए।
डिसलेक्सिया नामक बीमारी से पीड़ित थे आइंस्टाइन
16 जून, 2011
सिगमंड फ़्रायड के नाम अल्बर्ट आइंस्टीन का राजनैतिक पत्र
अमेरिकी राष्ट्रपति रुज्वेल्ट के नाम अल्बर्ट आइन्स्टाइन का पत्र
अलबर्ट आइन्स्टीन और रवीन्द्रनाथ टैगोर का संवाद
अलबर्ट आइन्स्टीन बीसवीं सदी की एक ऐसी विलक्षण और प्रखरतम वैज्ञानिक चेतना का नाम है, जिसने हमारे विश्व को वैज्ञानिक विकास के नए और उच्चतर सोपान प्रदान किये थे । अपने युग की उस प्रखरतम मेधा के विकास को शरीर विज्ञान के आधार पर समझने के लिए आइन्स्टीन की मृत्यु के पश्चात वैज्ञानिकों ने उनके मस्तिष्क को प्रयोगशाला में संरक्षित कर लिया था, जो आज भी सुरक्षित रखा गया है । यह जानने की कोशिश की जा रही है कि सामान्य मनुष्य और एक अति उच्च स्तरीय मेधावान पुरूष के मस्तिष्क की बनावट में क्या मूलभूत फर्क होता है जिसके कारण ऐसी प्रतिभा का विकास संभव होता होगा । वर्षो के अनुसंधान के बाद भी विज्ञान अभी कोई निर्णायक निष्कर्ष पर नहीं पहुॅच सका है । वह किसी ऐसे निष्कर्ष पर पहुॅच सकेगा यह अभी भी संदिग्ध ही है क्योंकि भारतीय दर्शन के अनुसार चेतना के स्तरों का विकास शरीर पर निर्भर नहीं होता । यह एक नितांत आत्यंतिक घटना होती है , जिसे नकार कर हम होमर से लेकर सूरदास तक के कितने ही विलक्षण जन्मांधों की ज्योतिहीन ऑखों से प्रकट हुए अनिर्वचनीय सौंदर्यलोक का रहस्य कभी जान नहीं पाएगें। फिर भी विज्ञान की इस कोशिश् से इतना अवश्य होगा कि कुछ ऐसी अबूझ भ्रांतियों का निवारण हो सकेगा जो मनुष्य के लिए सत्य के मार्ग में कभी भी और कहीं भी बाधा बन जाया करती है ।